आज 10 वर्ष बाद लखनऊ के सर्वाधिक अत्याधुनिक और वीवीआइपी इलाके हज़रतगंज में पंकज के दो एयरकंडीशंड रेस्टोरेंट हैं। जिनमें से एक तो इतना बड़ा है कि 200 आदमी एकसाथ बैठकर भोजन कर सकते हैं। तीसरा रेस्टोरेंट लखनऊ की एक अत्यधिक विकसित एवं चर्चित कॉलोनी में है। तीन मंज़िल का आलीशान मकान पंकज बाबू बनवा चुके हैं। हालांकि चलते अब भी सेकण्ड हैंड बजाज स्कूटर से ही हैं लेकिन बेहतरीन कार और महंगी मोटरसाइकिल भी घर पर खड़ी रहती है। इस विवरण से पंकज बाबू की हैसियत का अंदाज़ आप स्वयं लगाइए।
यह अंदाज़ लगाते समय यह ध्यान रखिएगा कि राजधानी लखनऊ में हजरतगंज की वही हैसियत है जो नई दिल्ली में कनॉट प्लेस की। या मुम्बई में लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स की।
कुछ दिन पहले मैंने पूछा तो पंकज ने बताया कि GST इनकम टैक्स समेत सारे अन्य आवश्यक रजिस्ट्रेशन तीनों रेस्टोरेंट के हैं। किसी भी प्रकार के डिजिटल पेमेंट की हर सुविधा मौजूद है।
पंकज की इस तरक्की का एक विशेष कारण है कि जब 2000 रू महीने की नौकरी पंकज ने प्रारम्भ की थी तब सवेरे 6 बजे से रात 12 बजे तक काम में व्यस्त रहना पड़ता था। बीच मे दोपहर में 3-4 घण्टे आराम करने का समय मिलता था। आज तीन रेस्टोरेंट का मालिक बन जाने के बाद भी पंकज की वह दिनचर्या आज भी नहीं बदली है।
क्योंकि 28 अगस्त 2007 को पंकज की उस छोटी सी दुकान के उदघाटन के समय पंकज के हाथ से बूंदी के लड्डू सबसे पहले खाने वालों में से एक मैं भी था इसलिए कह सकता हूं कि कुल 30-40 हज़ार की लागत से शुरू हुई पंकज की वह दुकान, पकौड़े बेंचनेवाली उस दुकान से कुछ ही बेहतर थी जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था।
अतः पकौड़े बेंचने की उस बात का मजाक करनेवाले धूर्तों/मूर्खों के बजाय प्रतीक के रूप में कही गयी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस बात के मायने वही समझ सकता है जो मेहनत करना जानता है। कामचोर हरामखोरों का समय ऐसी बातों की खिल्ली उड़ाने में व्यतीत होता है।
