राज्यसभा में अमित शाह ने कहा कि बेरोजगारी से अच्छा है कि कोई युवा पकौड़ा बेच रहा है. पकौड़ा बेचने में शर्म कैसी? इसकी भिखारी के साथ तुलना ना करें. अगर चाय वाले का बेटा पीएम बन सकता है, तो पकौड़े वाले का बेटा आगे जाकर उद्योगपति भी बन सकता है l
स्वरोजगार अच्छा विषय है, पर मेधावी स्टूडेंट को दुकानदार बनने के लिए प्रेरित करना कहाँ की अक्लमंदी है ?कोई भी देश महान उस देश की मेधा से ही होता है। फिर दूसरी बात क्या इससे शिक्षा का ह्रास नही होगा? जब पढ़ लिखकर ठेला ही लगाना है तो कोई उच्च शिक्षा के लिए क्यों प्रेरित होगा ?
सवर्णों को बैंक से व्यवसाय के लिए लोन भी बडी दिक्कत से ही मिलता है?जबकि इनकी अपेक्षा व्ययसाय के लिए बैंक से लोन मुस्लिमों और दलितों को आसानी से उपलब्ध है।आपको फेसबुक पर अनेक लोग इस तरह के मिल जायेंगे जो कहेंगे कि हाँ मैंने स्वरोजगार अपनाया और और मालामाल हुआ। पर ऐसे कितने लोग हैं ? क्या स्वरोजगार अपनाने वाले हमेशा सफल ही हुए हैं? अनेकों ऐसे उदाहरण इस तरह के मिल जायेंगे जिन्होने स्वरोजगार अपनाया, पर व्यवसाय चला नहीं और वे हताशा में आत्महत्या कर बैठे।
वास्तव मे स्वरोजगार के लिए उन्हें प्रेरित किया जाना चाहिये जो पढ़ाई में सफल नहीं हैं, जो हमेशा थर्ड डिग्री या सप्लीमेंट्री से पास होते हैं, पर नौकरी के लिए लालायित हैं और मां बाप का पैसा बर्बाद कर रहे हैं। स्वरोजगार के नाम पर उन मेधावी स्टूडेंट के साथ अन्याय न किया जाये जो जन्म लेते ही डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक बनने का सपना देखने लगते हैं l
मेरे यहाँ हर साल 150-200 डिग्री, डिप्लोमा धारी निकलते है जिसमे से करीब 100-150 "गधे" डिग्री डिप्लोमा जेब मे डाल कर घूमते है पर इन्हें नोकरी नही मिलती । जानते है क्यो ? ये ओ गधे है जो कभी थ्योरी, प्रैक्टिकल क्लास जॉइन नही किये, न ही कभी मुँह दिखाने आये एड्मिसन के बाद । हाँ परीक्षा जरूर पास कर लिए जुगाड़ ओर रट्टू तोता बन कर । और यही गधे हैं जो मोदी को दिन रात गरिआते है कि नोकरी नही दे रहा है फेकू ।
पकौडो पर बडे बडे लेख व व्याख्यान लिखे जा रहे हो और मुझसे चुप रहा जायें ये हो नहींसकता ।
Nageshwar Singh Baghel
मोदी जी ने पकोडी का ठेला लगाने वाले को भी रोजगार माना हैं तो कोई गलत नहीं माना मेरे पास बीसियों उदाहरण हैं जीते जागते जो साबित करते हैं कि पकोडे बेचने वाला आपकी सेकंड ग्रेड मास्टरी,क्लर्की कि पगार से भी ज्यादा कमाता हैं । और कमाई.का जरिया सिर्फ सरकारी नौकरियां नहीं हुआ करती हैं ये साबित करते हैं । गुजरात के महेसाणा जिले के कुछ युवा जो MBA कि डिग्रियों को घर पर रखकर खेती बाडी और भेंस का तबेला खोलकर बैठे हैं जिससे एक लाख रुपये महीना कमा लेते है ।
मैं एक गाँव का हि उदाहरण दूंगा एक लडका हैं शिव लाल नाम हैं उसका पांच साल पहले बाइस कि उम्र मे समोसे का ठेला लगाया था और आज आईसक्रिम पार्लर और साउथ इंडियन नाश्ते समेत कई तरह कि वेराइटिज वाली दो दुकाने खोलकर बैठा हैं और वो गर्व से कहता हैं पांच छः हजार रोज के हो जाते है । तो काबिल और कमाऊ पुत कौन हुआ बीएड वाला बेरोजगार या शिव लाल समोसे वाला!!
हकले खान कि एक मुवी आई थी "रईस" जिसका एक डायलाॅग बेहद प्रेरणास्पद था "धंधा कोई छोटा या बडा नहीं होता " एक चायवाला आज मुंबई मे दो ज्वैलरी शाॅप का मालिक हैं और वहीं कई डिग्री धारी फेसबुक पर बैठकर सरकार के खिलाफ बकैती पेलते हैं जबकी किसी सरकारी नौकरी वाले से पूछना कि इसके लिये कितने घंटे पढाई कि थी ।


ऐसे ही एक और उदाहरण देवास की प्रसिद्ध मटके वाली आइसक्रीम "विशाल मटका कुल्फी" वाले कभी ठेले में मटका कुल्फी बेचते थे । अब देवास में तहसील चौराहे पर बड़ी सी दुकान ले लिया जहाँ दिन भर मटका आइसक्रीम खाने वालों की भीड़ लगी रहती है । तो मोदी का मजाक उड़ाने वालो ..... "काबिल बनो करम जले नहीं। नही तो जिंदगी ऐसे ही चुगली चाटी में निकल जायेगी और बीबी पड़ोसी से "सेट", हो जाएगी ।।
काबिलियत होगी तो पकोड़े बेचकर भी नाम कमा सकते हो,,
बिना योग्यता के डिग्री गले में लटका कर घूमते रहो ,,कुत्ता भी नही सुंघेगा
कोंग्रेसीयो, वामपंथियों ओर आपियो को समर्पित
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