सुप्रीम कोर्ट ने श्रीराम जन्मभूमि केस में आपसी सुलह का सुझाव दिया है। सुलह के प्रयास पहले भी हो चुके हैं और हर बार हिंदुओं की ओर से ही हुए हैं। 1991 में विश्व हिन्दू परिषद और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की सुलह बैठक में बाबरी की ओर से मार्क्सवादी इतिहासकारों ने मोर्चा संभाला था।
डीएन झा, इरफ़ान हबीब जैसे कम्युनिस्ट धूर्तों ने वहाँ "मन्दिर नहीं था" सम्बन्धी एक भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया बल्कि हर बैठक में "राम और सीता तो भाई-बहन थे" या "राम का जन्म तो लाहौर में हुआ था" जैसी भ्रामक बातें कहकर विहिप नेताओं को उकसाने, भड़काने का काम किया।
उस समय बाबरी कमेटी के कठमुल्ले इन बकवासों का आनन्द लेते रहे। विहिप नेताओं का पारा चढ़ा तो बाबरी को ही जमींदोज कर दिया। श्रीराम जन्मभूमि से इस्लामी आस्था का कोई लेना देना न होने के बावजूद भी इस पूरे विवाद में मार्क्सवादियों ने ही मुसलमानों को अड़ियल रुख अपनाने को दुष्प्रेरित किया।
आज भी पर्दे के पीछे से यही बुद्धिपिशाच लड़ रहे हैं हिन्दुत्व से। इनके लिए दिक्कत यह हुई कि काँग्रेस की फेंकी हड्डियों पर पलते हुए विश्विद्यालयों, बौद्धिक संस्थानों और मीडियाई गिरोहों पर एकतरफा कब्जा कर अपना झूठ तो बदस्तूर थोपते रहे लेकिन अदालती लड़ाई में यह मामला झूठ और लफ्फाजी से नहीं बल्कि तर्कों, तथ्यों, प्रमाणिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों से ही जीता जा सकता है, जोकि इनके पास है नहीं। मत करो सुलह-समझौता! हाई कोर्ट में इनका झूठ नंगा हो ही चुका है, सुप्रीम कोर्ट में भी इस्लामी बर्बरता और मार्क्सवादी झूठ की हार बस समय की बात रह गयी है।

ये स्क्युलरो की बिकी हुई सोच वक्त पर तो अपने खान्दान को बेच देंगे...
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से पेश 15 इतिहासकारों में से 12 हिन्दू है
इनका कहना है कि अयोध्या में राम_मंदिर कभी था ही नही !
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से पेश 15 इतिहासकारों में से 12 हिन्दू है
इनका कहना है कि अयोध्या में राम_मंदिर कभी था ही नही !
गवाह नं 63 आर एस शर्मा , गवाह नं 64 सूरज भान , गवाह नं 65 डी एन झा ,
गवाह नं 66 रोमिला थापर गवाह नं 72 बी एन पाण्डेय, गवाह नं 74 आर एल शुक्ला,
गवाह नं 82 सुशील श्रीवास्तव गवाह नं 95 के एम श्री माली,
गवाह नं 96 सुधीर जायसवाल, गवाह नं 99 सतीश चंद्रा
गवाह नं 66 रोमिला थापर गवाह नं 72 बी एन पाण्डेय, गवाह नं 74 आर एल शुक्ला,
गवाह नं 82 सुशील श्रीवास्तव गवाह नं 95 के एम श्री माली,
गवाह नं 96 सुधीर जायसवाल, गवाह नं 99 सतीश चंद्रा
गवाह नं 101 सुमित सरकार,गवाह नं 102 ज्ञानेन्द्र पांडेय,
In the mid-1970s, the Congress Govt which desperately wanted to appease minorities had set up an archaeological team to excavate the site around Babri Masjid and appointed a Muslim archaeology expert (KK Mohammed) as the head of the team, with an unofficial order to twist history in favour of Muslims.
But KK Mohammed put truth above religion and acknowledged that there was actually a Hindu temple under Babri Masjid. Unhappy with his findings (since he could not manipulate evidence in favour of Muslims), he was sidelined for decades by the secular parties.
Now, after 24 years, he has come out in open & has explained everything about the politics behind Babri Masjid controversy in his autobiography, written in Malayalam.
He has exposed the so-called secularism of Congress which is nothing but anti-Hindu, even at the cost of manipulating history, and has blamed leftist historians for hijacking truth, brainwashing youngsters and preventing a resolution on for the Babri Masjid dispute.