If Islamic States Can Get Rid Of Triple Talaq, Why Not India?
आपने इस्लामी रीत-रिवाजो को लेकर शोसल मीडिया में कई दिन से ''ट्रिपल तलाक और हलाला'' के बारे में जानकर निस्चय ही छुब्ध होंगे/क्रोधित होंगे/अचंभित हुए होंगे ! भारत के मुल्ला -मौलवी/अरबी शेख/भारत के धनाढ्य मुसलमान अपने अय्यासी के लिए इस्लाम के सरिया कानून का कैसे सहारा लेते है ये तो आप जान ही चुके है ! पर अभी बहुत कुछ जानना बाकी है आपको ! तो लीजिये इस्लामिक रीतिरिवाज में ''मुताह और खुला'' के बारे में जानिये !
दरअसल मुताह यह एक तरह का निकाह ही होता है जिसमें पहले से ही समय तय कर लिया जाता है कि मियां-बीबी कितने समय तक साथ रहेंगे। इसके लिए बाकायदा औरत को पैसा दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को यदि इस्लामी कानून आधारित वेवृत्ति कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं कि खाड़ी देशों से महीने-दो महीने के लिए मर्द वापस जब आते हैं तो वक्त बिताने के लिए, अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए उन्हें कोई औरत चाहिए होती है और वे जिम्मेदारी भी नहीं निभाना चाहते। इसलिए वे मुताह निकाह करते हैं।
जितने दिन का करार तय हो जाता है, उतने दिन के बाद सब कुछ खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है। बाकायदा काजी के सामने यह निकाह होता ! मेरी नजर में तो ये सुध्ध रूप से वेब्रित है ! और इस वृति को इस्लामिक मान्यता मिली हुई है ! वाकई में ये इस्लाम है या गर ??
चलिए अब आगे बढ़ते है और जानते है ''खुला'' क्या है ! दरअसल ये खुला भी एक तरह का तलाक होता है ! जो औरत की ओर से मर्द को दिया जाता है लेकिन यह ‘तीन तलाक’ के जैसा नहीं होता औरत अगर मर्द से खुला मांगती है तो अंतत: देता मर्द ही है।

अगर वह नहीं चाहे तो उसे मनाना पड़ता है। किसी काजी, किसी बुजुर्ग या दोस्त से दबाव डलवाना पड़ता है या कुछ संपत्ति वगैरा देकर मनाना पड़ता है। औरत को बच्चों से मिलने का अधिकार छोड़ना पड़ता है या मेहर की रकम भी छोड़नी पड़ती है।
इस तरह कुछ चीजें छोड़कर महिला को तलाक मिलता है। इतना सब होने के बावजूद अंतिम घोषणा पुरुष को ही करनी पड़ती है। महिला सब कुछ दे दे, तब भी ‘तलाक-तलाक-तलाक’ की घोषणा पुरुष ही करता है ।
इस्लाम में गजब की असमानता है, नारी के लिए इस्लाम नर्क का द्वार है ?......Nageshwar Singh Baghel

