
#दोगला_मुस्लिम_प र्सनल_लॉ_बोर्ड...इस्लाम में व्यापक धर्म सुधार आंदोलन नहीं हुआ तो ये धर्म के अफीमची इस्लाम और दुनिया को बहुत नुकसान पहुंचाने वाले है।
शरीयत के हिसाब से तीन तलाक़ चाहते हो, चार शादी चाहते हो तो शरीयत के हिसाब से मुसलमानों के लिए पृथक क्रिमिनल कोड की भी माँग क्यूँ नहीं करते अगर मुस्लमान पर चोरी का आरोप सिद्ध हो तो शरियतानुसार उसका हाथ काटा जाये और हत्या या ड्रग तस्करी में गर्दन काटी जाए, इस विषय में बोर्ड वालों को सांप सूंघ जाता है। डॉ. कलाम की प्रतिमा लगाने की बात आती है तो ये शरीयत में मूर्ति एवं चित्रों को हराम बताकर इसका विरोध करते है किंतु खुद की जेब में "गांधीछाप" गड्डी दबा दबा के रखते है अगर शरीयत में मना है चित्र तो निकाल फेकों सारे नोट इनके हिसाब से तो सारे हजयात्री गैरशरिया काम कर रहे है पासपोर्ट वीसा बिना चित्र लगाये नहीं बन सकता और पासपोर्ट वीसा के बिना हजयात्रा नहीं हो सकती, बोलो है दम पासपोर्ट से फोटो हटाने का या हजयात्रा को हराम बताने का?
शरीयत ब्याजखोरी को हराम बताती है इस हिसाब से जितने भी मस्जिद मदरसों और बोर्ड के बैंक एकॉउंट है वो सभी हराम हो गए बैंक एकॉउंट या बैंक लोन यानि ब्याज और ब्याज यानि हराम, बोलो क्या स्वीकार कर पर पाओगे कि मुस्लिम संस्थानों में लगने वाला बैंक का पैसा हराम है।
संपूर्ण ब्रह्माण्ड प्रतिपल परिर्तनशील है समय के अनुसार खुद को ढालना न तो गैरइस्लामिक है न अप्राकृतिक है! "शरीयत में वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी हराम है ये अलग बात है कि मुस्लिम पर्सन्ल लॉ बोर्ड के मौलाना खुद टीवी चैनलों में उचक उचक कर बता रहें हैं कि क्या शरीयत है और क्या शरीयत के खिलाफ"।वाह रे गलों।इस्लाम रूढ़िवाद का प्रतीक है क्रांति और प्रगतिशीलता का नहीं।
Nageshwar Singh Baghel भारतीय मुस्लिमों को तीन तलाक मामले में शरीया क़ानून के पालन की अनुमति दी जानी चाहिए. केवल उनसे और उनके परिवार वालों से लिखित में यह ले लेना चाहिए कि वे भविष्य में भी भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट को नहीं मानेंगे, केवल शरीयत क़ानून ही मानेंगे...
फिर 1 जनवरी 2017 के बाद एक शरीया कोर्ट बैठे, जिसमें केन्द्र-राज्य सरकार की तरफ से भी मौलाना-मौलवी नियुक्त होंगे... उसके बाद चोरी के आरोप में पकड़े गए मुस्लिम के हाथ काटे जाने चाहिए... बलात्कार के आरोपी मुस्लिम को एक गढ्ढे में आधा गाड़कर पत्थर मारते हुए उसकी मौत मुकर्रर होनी चाहिए... हत्या के दोषी मुस्लिम को चौराहे पर फाँसी देनी चाहिए... यानी उनके शरीया में जो और जैसा लिखा हो, बिलकुल वैसी ही सजा उसे दी जाए... और वो भी ताबड़तोड़... जैसी सऊदी अरब, लीबिया वगैरा में दी जाती है. संविधान-हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के चक्कर में फ़ोकट में टाईम खोटी करने करने की जरूरत नहीं...
