डा. नूरूल हसन ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषण करते हुए
कहा- महमूद गजनवी औरंगजेब आदि मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं
के नरसंहार एवं मंदिरों को तोड़ने के प्रसंग राष्ट्रीय एकता में बाधक है
अत: उन्हें नहीं पढ़ाया जाना चाहिए....
यह बात सन १९७१ की है. इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए वामपंथी लोगों से मदद चाहिए थी.... तो समझौता यह हुआ था कि आप प्रधानमंत्री बनी रहो और हमारे लोगों को देश का शिक्षा बोर्ड दे दो., इसीलिए कट्टर वामपंथी विचारधारा वाले डा. नूरूल हसन को केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री का पद सौंपा गया था....
कट्टर वामपंथी विचारधारा वाले इतिहासकारो ने भारत के गौरवमयी इतिहास की सच्चाई को छिपा कर तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर विकृतिकरण करने का बीड़ा उठाया, मनमुटाव द्वेष को बढ़ावा देने के सभी सरंजाम किये ताकि भविष्य में भारत के कई टुकड़े होते रहे, इसकी घोर साज़िश की! उन्होनें प्राचीन हिन्दू इतिहास तथा पाठ्य पुस्तकों के विकृतिकरण का बीड़ा उठा लिया था ....
*सन १९७२ में इन सैकुलरवादियों ने "भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद" का गठन कर इतिहास पुनर्लेखन की घोषणा की और सुविख्यात इतिहासकार यदुनाथ सरकार, रमेश चंद्र मजूमदार तथा श्री जी.एस.सरदेसाई जैसे सुप्रतिष्ठित इतिहासकारों के लिखे ग्रंथों को नकार कर नये सिरे से इतिहास लेखन का कार्य शुरू कराया गया....*घोषणा की गई कि इतिहास और पाठ्यपुस्तकों से वे अंश हटा दिये जाएँगे जो राष्ट्रीय एकता में बाधा डालने वाले और मुसलमानों की भावना को ठेस पहुँचाने वाले लगते हैं...

मुगल शासनकाल में मुसलमानों ने हिंदुओ पर या जैनों पर कैसे-कैसे अत्याचार किए हैँ, इसका इतिहास किसी ने नहीं लिखा -- कि कितने सुंदर मंदिरो को उन्होंने नेस्तनाबूत कर दिया, कितनी हजारों प्रतिमाओं और अनेकों सदियों के श्रम से निर्मित कला के नमूनों को मिटा डाला, कितनी स्त्रियों के साथ बलात्कार किए, और कितने आदमियों को मजबूर कर दिया कि या तो मुसलमान बनो, या फिर अपनी मृत्यु स्वीकारो!
भारत में जितने मुसलमान हैँ, वे सब अरब से नहीं आए हैँ। वे सब मार-मार मुसलमान बनाए गए हैं -- तलवार की नोक पर -- तर्क से, बौद्धिक ढंग से समझा कर नहीं। यह सिद्ध करके नहीं कि इस्लाम अन्य धर्मों की अपेक्षा श्रेष्ठ है। मुसलमानों ने सिर्फ एक ही तर्क का उपयोग किया, वह थी उनकी तलवार! लेकिन तकरीबन पंद्रह सदियों से निरंतर चली आ रही इन हत्याओं व बलात्कारों की कहानी कहने वाली एक भी पुस्तक नहीं है।
प्रत्येक धर्म की ओर गौर से देखना होगा, खोज-बीन करनी होगी, और जनता को पूरी तरह सच्चाई से अवगत कराना होगा कि ये मानवता के साथ क्या-क्या अपराध करते रहे हैँ। उनकी धार्मिक-भावनाओं को चोटें लगती हैं, इन बेवकूफी भरी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए। वे मनुष्यता पर कहर ढाते रहे, अपराध करते रहे...और सच बात बोलो तो उनकी धार्मिक भावनाएं चोट खा जाती हैं।
अब समय आ गया है कि निर्दयतापूर्वक उन सबकी पोल खुलनी चाहिए, क्योंकि तभी एक नये मनुष्य के जन्म के लिए भूमि तैयार होगी, जिसे मैं विद्रोही, रिबेल कहता हूं। उसी से इन सारी कुरूप संस्थाओ और संप्रदायों के विरुद्ध एक महाविद्रोह पैदा होगा, और पूरी मानवता एक प्रेमपूर्ण संबंध में जुड़ सकेगी -- राष्ट्रों के बगैर, धर्मों के बगैर, पर एक गहन धार्मिकता में डूबी हुई, जीवन के प्रति समादरपूर्ण और इस अस्तित्व के प्रति अहोभाव से ओत-प्रोत।
सिर्फ एक व्यापक विद्रोह की, बगावत की जरुरत है; खासतौर से युवा पीढ़ी में, क्योंकि भविष्य उन्हीं का है...और अतीत की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।....................Dev Kumar Pandey