हर शहर में एक कैराना बन रहा है, बहुत देर हो गई अब आँखें खोलें !


Kumar Gyanendra ... पुनः आज नदी से स्नान कर अघोरी बाहर निकला और प्रेत ने आकर पकड़ लिया.- मेरी कथा सुनो अघोरी, सुनो और सभी देशवासियों को भी सुनाओ. बताओ की कैराना से भी भीषण अवस्था अनेक शहरों की है, हर राज्य में यह है. यह कथा हर बस्ती की है, मेरे स्थान पर कोई अन्य होगा परंतु हिंदुओं के साथ यह हो ही रहा. आंखें बंद किए लोगों को नही दिखेगी पर जो तनिक ध्यान दे वह देख लेगा.

देश के किसी भी शहर में हिंदु होकर व्यवसाय करना और जीना असंभव है. मैं पिछले वर्ष एक शहर में किराए के ठेले पर सब्जी बेचता था, मुझे फल-सब्जी बेचने में लाभ नही होता था क्योंकि बिना पैसे दिए मुझे मंडी से सब्जी नही मिलती थी, इसके उलट मंडी से कुछ लोगों को उधार सब्जी मिलती थी. वे बेचकर मुनाफा लेते थे और तब पैसे देते थे. साथ के एक बूढ़े ने कहा कि देखो, यह हमारे समाज की एकता है. तुम भी हममें आ जाओ या यूं ही मरो. यहां रहकर पढ़ने वाला, किसी दूसरे शहर का एक युवक एकदिन मुझसे बोला कि यह हाल सभी क्षेत्र में है, उसके सभी मित्र धर्म देखकर ट्यूशन पढ़ते हैं. वह युवक एकदिन एक संस्था के लोगों को लेकर आया और उन्होंने मुझे एक ठेला खरीद दिया, मंडी के अनेक हिंदु थोक विक्रेताओं से पहचान करा दी,

मैं गौरवान्वित था कि मेरा हिंदु समाज मेरे साथ खड़ा हुआ पर यह खुशी टिक नही सकी. जैसे ही उनलोगों को खबर हुई, उन सबने थोक में फल-सब्जियां इतनी सस्ती कर दी की हम मुकाबला नही कर पाए. कई अन्य हिन्दू विक्रेताओं को भी लगा की यह विवाद मेरे बढ़-चढ़कर संगठित करने के प्रयासों के कारण हुई है, सभी विवाद के लिए मुझे दोष देने लगे. उनको एकता ही उनकी शक्ति थी और हमारा व्यावसायिक दृष्टिकोण हमारी कमजोरी बन गया.

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मैंने सोचा की अधिकतर ग्राहक तो नियमित होते हैं, यदि बेचने वाले धर्म की प्राथमिकता के अनुसार व्यवहार करते हैं तो क्रेता भी धर्म तय करके क्रय करें. मैंने कुछ नियमित ग्राहकों से बताया की व्यवसाय में अल्पसंख्यक धर्म की प्राथमिकता पर सुविधा मिलती है, एक महिला डॉ मेरी ग्राहक थीं जिन्होंने बताया की मैं अस्थिरोग की डॉ. हूँ और पिछले दो साल से मेरे पास एक भी मुसलमान मरीज नही आया क्योंकि दो साल से एक मुसलमान डॉ. होकर आया है, उनका सूचनातंत्र कितना प्रभावशाली है और निर्णय की क्षमता कितनी प्रभावपूर्ण है यह देखो. उसी संध्या को घर वापस आते हुए मुझे अकेला घेर लिया गया और बताया गया की दीन की राह में बलिदान लेना उनका धर्म है, मैं अकेला था और बचपन में सुना था- स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः
मैंने संघर्ष की मृत्यु चुनी और आजतक भटकता रहा की किसी को अपनी कथा सुना पाऊं. अब मुझे मुक्ति मिलेगी. याद रहे की हर शहर में एक कैराना है, जिस दिन तक आँखें खुलें- देर न हो जाए. लोगों को कहो की अपने शहर के धर्म जागरण के लोगों से मिलें, जानकारी जुटाएं. बहुत विलंब हो चुका है. ...... अघोरी स्तब्ध रह गया और प्रेत व्योम में विलीन हो गया