पं. दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती आयोजन एकात्म मानववाद की प्रगतिशील राष्ट्रीय विचारधारा को समर्पित है !!



भारतीय सनातन विचार को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए, राष्ट्र में समतामूल समाज के लिए एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा के प्रणेतापुरुष , युवा मन के प्रेरणापुरुष, आजादी के सार्थक समर्थक, अंत्योदय की संकल्पना से मानव हितरक्षक, भारतीय संस्कृति के संरक्षक, पाञ्चजन्य पत्रिका के संस्थापक, मानवता के लिये आजीवन सतत संघर्षशील महान् आत्मन् पं. दीनदयाल उपाध्याय जी को जन्मजयन्ती पर शत् शत् साष्टांग प्रणाम...
भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ ५२ साल क उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी दीनदयालजी उच्च-कोटि के दार्शनिक थे किसी प्रकार का भौतिक माया-मोह उन्हें छू तक नहीं सका। महान चिन्तक व दार्शनिक शत् शत् साष्टांग प्रणाम............Lalit Pandey Aarsheya
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पं.दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती 
जन्म:- 25 सितम्बर 1916- #जन्मशती #25सितंबर2016
जन्म स्थान:- नगला चन्द्रभान (मथुरा), उत्तर प्रदेश,  भारत
मृत्यु:- 🌺11 फ़रवरी 1968 (स्वतन्त्र भारत में मुगलसराय-बिहार के आसपास रेल में संदिग्ध हत्या)
राजनीतिक दल:- भारतीय जनसंघ के संस्थापक 1951
आप महान चिन्तक और संगठनकर्ता थे। वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को 🚩#एकात्ममानववाद 🚩 व #अंत्योदय जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। जो आगे चलकर#भारतीय_जनता_पार्टी" की मुलभुत अवधारणा व शासन के मूल लक्ष्य के रूप में अंगीकृत की गयी।
पं. उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य में भी उनकी गहरी अभिरुचि थी। उनके हिंदी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। केवल एक बैठक में ही उन्होंने "#चन्द्रगुप्त#नाटकलिख डाला था।
संक्षिप्त जीवनी:- दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को मथुरा जिले के छोटे से गाँव नगला चन्द्रभान में हुआ था। इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था। माता रामप्यारीबाई धार्मिक वृत्ति की थी।
उपाध्यायजी ने पिलानी, आगरा तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की। बी०.एस०सी० बी०टी० करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की। *छात्र जीवन से ही वे "#राष्ट्रीय_स्वयंसेवक_संघ" के सक्रिय कार्यकर्ता* हो गये थे। अत: कालेज छोड़ने के तुरन्त बाद वे उक्त संस्था के #प्रचारकबना दिये गये और एकनिष्ठ भाव से अपने दल का संगठन कार्य करने लगे।
*सन 1951 ई० में "अखिल भारतीय जनसंघ" का निर्माण* होने पर वे उसके मन्त्री बनाये गये। दो वर्ष बाद *सन 1953 ई० में पं. उपाध्यायजी अखिल भारतीय जनसंघ के महामन्त्री निर्वाचित हुए और लगभग 15 वर्ष तक इस पद पर* रहकर उन्होंने अपने दल की अमूल्य सेवा की। #कालीकट_अधिवेशन (दिसम्बर 1967) में वे #अखिल_भारतीय_जनसंघ के#अध्यक्ष निर्वाचित हुए*। 11 फरवरी 1968 की रात में रेलयात्रा के दौरान मुगलसराय के आसपास उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में #हत्या कर दी गयी।
मैट्रिक और इण्टरमीडिएट-दोनों ही परीक्षाओं में गोल्ड मैडल।
 कानपुर विश्वविद्यालय से आपने बी० ए० किया।
 *सिविल सेवा परीक्षा में भी उतीर्ण हुए लेकिन ज्वाइन नहीं किया*।
 *1937 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये*।
 1942 से पूरी तरह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लिये काम करना शुरू किया।
 #राष्ट्रधर्म#पाञ्चजन्य और #स्वदेश जैसी पत्र-पत्रिकाएँ प्रारम्भ की*।
*1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना के समय उत्तर-प्रदेश का महासचिव बनाया*।
उपाध्यायजी की कृतियाँ:  उपाध्यायजी पत्रकार तो थे ही चिन्तक और लेखक भी थे। *उनकी असामयिक मृत्यु से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जिस धारा में वह भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा 🚩#सांस्कृतिक_हिन्दुत्व🚩 की थी; जिसका संकेत उन्होंने अपनी कुछ कृतियों में ही दे दिया था। तभी तो जनसंघ के "कालीकट अधिवेशन" के बाद विश्व भर के मीडिया का ध्यान उनकी ओर गया*। बहरहाल यहाँ पर उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम दिये जा रहे हैं।
📝दो योजनाएँ (अंग्रेजी: The Two Plans),
📝राजनीतिक डायरी (अंग्रेजी:Political Diary),
📝भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन (अंग्रेजी:Devaluation and Indian Economic Policy),
📝सम्राट चन्द्रगुप्त (अंग्रेजी:Samrat ChandraGupta),
📝जगद्गुरु शंकराचार्य (अंग्रेजी: Jagadguru Shankracharya) और
📝"एकात्म मानववाद" (अंग्रेजी: Integral Humanism)
 *एकात्म मानववाद* : पं. दीनदयालजी उपाध्याय ने व्यक्ति व समाज ''स्वदेश व स्वधर्म'' तथा परम्परा व संस्कृति'' जैसे गूढ़ विषय का अध्ययन, चिंतन व मनन कर उसे एक दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने देश की राजनैतिक व्यवस्था व अर्थतंत्र का भी गहन अध्ययन कर शुक्र, वृहस्पति, और चाणक्य की भांति आधुनिक राजनीति को शुचिता व शुध्दता के धरातल पर खड़ा करने की प्रेरणा दी। 

*उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति समाज व सृष्टि का ही नहीं अपितु मानव के मन, बुध्दि, आत्मा और शरीर का समुच्चय है। उनके इसी विचार व दर्शन को ''एकात्म मानववाद'' का नाम दिया गया, जिसे अब "एकात्म मानव-दर्शन" के रूप में जाना जाता है*। एकात्म मानव-दर्शन राष्ट्रत्व के दो पारिभाषित लक्षणों को पुनर्जीवित करता है, जिन्हें ''चिति'' (राष्ट्र की आत्मा) और ''विराट'' (वह शक्ति जो राष्ट्र को ऊर्जा प्रदान करता है) कहते हैं। इस प्रकार *'एकात्म मानववाद' सनातन भारतीय संस्कृति के मूल विचार 'वसुधैव कुटुम्बकम' ('समस्त विश्व एक परिवार है'।) व 'प्रकृति के साथ साम्य' पर आधारित होकर एक समग्र दर्शन है; जो आधुनिक राज्य(विश्व) को श्रेष्ठ शासन व्यवस्था हेतु नीति निर्देशक के रूप पंडितजी की देन और भाजपा का पथ-प्रदर्शक दर्शन है*।............



Nilesh Upadhyay