"किसी भी कृत का महत्व उसकी कार्य योजना और क्रियान्वयन की कार्यशैली द्वारा निर्धारित होता है, और यही प्रयास की सार्थकता की दृस्टि से, परिणाम पर निष्कर्ष के प्रभाव के सन्दर्भ में किसी भी प्रक्रिया का महत्व होता है, फिर कार्य चाहे जो हो ! अगर व्यावहारिक जीवन में भी देखें तो किसी भी कार्य के सन्दर्भ में गलत या सही में अंतर केवल करने के तरिके का ही होता है, फिर कार्य चाहे जो हो !
जहाँ तक बात राष्ट्र की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की है तो हमारे देश की सेना हमेशा से ही इसमें सक्षम थी, बात केवल इतनी सी है की अगर आज हम सैन्य शक्ति के प्रयोग से किसी भी समस्या का समाधान ढून्ढ रहे हैं तो इसका तात्पर्य तो यही निकलता है की समस्या के समाधान के अन्य सारे विकल्प समाप्त हो चुके हैं , और ऐसी परिस्थिति में राष्ट्र का उसके शीर्ष नेतृत्व की कूटनीतिक दक्षता पर संशय होना स्वाभाविक है !
प्यास लगने पर कुआँ खोदने के किसी भी प्रयास को क्या बुद्धिमानी कहा जा सकता है ?
शक्ति का बल युद्ध ही नहीं बल्कि संधि के शर्तों के लिए भी निर्णायक आधार होता है क्योंकि शक्तिशाली ही संधि के नियम तय करता है और इसीलिए किसी भी राष्ट्र के लिए शक्ति शाली होना ही उसके सुख, शांति और समृद्धि का निश्चित आश्वासन हो सकता है ; अगर किसी भी राष्ट्र के लिए युद्ध अपरिहार्य हो जाए तो उसके लिए यह अनिवार्य हो जाता है की वह समय द्वारा प्रस्तुत संघर्ष को उसके निर्णायक परिणाम तक पहुंचाए पर किसी भी सभ्य समाज व् परिपक्व राष्ट्र के लिए यह आखरी विकल्प होना चाहिए।
भारत की शान्ति और सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दृष्टि से भारतीय सशस्त्र सेना द्वारा उठाये जाने वाले किसी ही प्रयास का यह देश समर्थन करता है और करना भी चाहिए, पर इसका यह अर्थ नहीं की देश को अपने नेतृत्व की अयोग्यता, अक्षमता और अस्पष्ट रणनीति को अनदेखा करना चाहिए, क्योंकि ऐसा कोई भी प्रयास भविष्य को और भी अधिक अनिश्चित और जटिल बना देगा।
राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी संघर्ष में यह देश को एकजुट होना ही चाहिए पर इसका यह अर्थ नहीं की वह समय द्वारा सत्यापित नेतृत्व की अयोग्यता के प्रत्यक्ष प्रमाण की उपेक्षा करे; संघर्ष की समाप्ति पर राष्ट्र के लिए नेतृत्व की समीक्षा आवश्यक होगी !
भारतीय सेना का आतंकवाद के विरुद्ध उठाया गया साहसिक कदम प्रशंशनीय व् स्वागत योग्य है पर विश्व समुदाय इसे भारत द्वारा किसी अन्य राष्ट्र की संप्रभुता पर आक्रमण अथवा अतिक्रमण न समझे; हमारा संघर्ष किसी राष्ट्र से नहीं बल्कि आतंकवाद से है और अगर कोई राष्ट्र आतंकवाद को अपनी विदेश नीति मानकर भारत के इस कदम को अपने पर आक्रमण माने तो यह उनका निर्णय होगा !
ऐसे किसी दृष्टिकोण का परिणामस्वरूप अगर भारत पर युद्ध थोपा गया तो भारतीय सेना भी अपने कर्त्तव्य के दायित्व को निभाने से पीछे नहीं हटेगी , ऐसी स्थिति में युद्ध हमारे लिए निर्णायक होगा और हम केवल संघर्ष के लिए नहीं बल्कि समस्याओं के स्थाई समाधान और विजय सुनिश्चित करने के लिए ही रणभूमि में उतरेंगे , फिर इसके लिए चाहे जो कुछ भी करना पड़े , हमें तैयार रहना होगा। पर क्या यह परिस्थितियों के प्रति परिपक्व दृष्टिकोण होगा; इस विषय पर सभी को विचार करना होगा !”

