"परिस्थितियों के परिवर्तन के किसी भी प्रयास की परीक्षा धैर्य से होती है और इसलिए, समय द्वारा प्रस्तुत किसी भी संघर्ष के प्रति मनोभाव और चुनौतियों के प्रति दृष्टिकोण, अवरोध को अवसर में रूपांतरित करने के लिए निर्णायक होता है; फिर बात व्यक्ति की हो या राष्ट्र के रूप में किसी समाज की, यह सिद्धान्त सामान रूप से सभी पर लागु होता है।
अगर देखा जाए तो शक्ति और दुर्बलता में केवल प्रयोग का ही अंतर होता है और इसीलिए, संसार की सभी बड़ी असफलताओं का कारन सही मनोभाव विहीन प्रतिभा ही रही है।
शिक्षा का ज्ञान और विवेक की बुद्धि में भी केवल प्रयोग का ही अंतर होता है और इसलिए, व्यवहारिकता के निर्धारण में जब तक सैद्धान्तिक विचारधारा का प्रभाव सामाजिक व्यवहार में प्रतिबिंबित न हो, हम यथार्थ में आदर्श का उदाहरण प्रस्तुत करने में सक्षम हो ही नहीं सकते। फिर प्रयास हम चाहे जितना भी कर लें, परिणाम केवल समय और श्रम की व्यर्थता ही सिद्ध करेगा क्योंकि किसी भी प्रयास की सफलता के लिए प्रयास की दिशा निर्णायक होती है !
एक स्तर पर आकर सामाजिक उत्क्रांति के प्रयास को अपने चरण में परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि समाज में व्यक्ति और व्यवस्था दोनों ही एक दुसरे पर अन्योन्याश्रित (संपूरक) हैं, समाज में जैसी व्यवस्था होगी वह अपने लिए वैसे ही व्यक्ति का निर्माण करने में रूचि रखेगा और समाज में जैसा व्यक्ति की मानसिकता होगी, वह अपने लिए वैसी ही व्यवस्था चुनेगा; ऐसे में, प्रश्न यह उठता है की अगर समाज को भ्रस्टाचार, शोषण व् निर्धनता से मुक्ति चाहिए तो प्रयास का केंद्रबिंदु क्या होना चाहिए, व्यक्ति या व्यवस्था !!
व्यवस्था को भी चलाने के लिए व्यक्ति की आवश्यकता होती है और इसलिए, समाज में व्यक्ति निर्माण का प्रयास ही सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया का पहला चरण हो सकता है पर एक स्तर पर आकर समाज की संगठित शक्ति के लिए यह आवश्यक हो जाता है की वह व्यवस्था को अपने हाथों में ले, ऐसा इसीलिए, क्योंकि व्यक्ति और व्यवस्था एक दुसरे के सम्पूरक हैं और समाज में व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया की सार्थकता के लिए व्यवस्था को युगानुकूल रूप से धर्मसंगत, विधिवत और न्यायोचित बनाना आवश्यक हो जाता है।
ऐसा आवश्यक इसलिए भी है क्योंकि जब बहुमत की मानसिकता भ्रस्टाचार, स्वार्थ, लोभ व् लाभ से संक्रमित हो तो उनके लिए स्वाभाविक है की धन का महत्व जीवन मूल्यों से अधिक हो जाएगा और ऐसे में अगर यथार्थ में सिद्धान्तों का व्यावहारिक प्रयोग कर आदर्श का उदाहरण प्रस्तुत करना है तो बहुमत से अधिक नैतिकता को निर्णय का अधिकार प्राप्त होना ही चाहिए, अन्यथा, अनुकूलन के प्रभाव में जीवन परिवर्तन से प्रतिरक्षित हो जायेगी और वैचारिक संक्रमण को ही जीवनशैली मानकर स्वीकार कर लेगी ; यही तो आज हो रहा है !
राष्ट्र को उचित नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता अगर राजनीति में होती तो आज भारत की यह दुर्दशा नहीं होती, राजनीति जनतंत्र में सत्ता प्राप्ति का माध्यम हो सकता है पर किसी भी परिस्थिति में लोकप्रियता के आधार पर नेतृत्व के पात्र की योग्यता के निर्धारण का अधिकार राजनीतिक दल को नहीं दिया जा सकता ; ऐसा इसलिए, क्योंकि बात केवल राजनीति की नहीं बल्कि राष्ट्र की है ;
जब राष्ट्र को वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान करने की आवश्यकता हुई तो 'संघ' ने राष्ट्रीय पटल पर एक नए राजनीतिक दल को जन्म दिया, इसलिए नहीं क्योंकि संघ को राजनीति करनी है बल्कि इसलिए क्योंकि वह राष्ट्र के सन्दर्भ में समय की आवश्यकता थी और आज जब राष्ट्र को योग्य नेतृत्व प्रदान करने की आवश्यकता है तो 'संघ' राजनीति नहीं करेगा और न ही अपने कर्त्तव्य से पीछे हटेगा।
गत नब्बे वर्षों से संघ समाज में व्यक्ति निर्माण के प्रयास के प्रति समर्पित है और अपनी तपस्या से समाज में 'अग्रसर' का निर्माण कर रहा है; आज जब राष्ट्र को नेतृत्व के लिए एक योग्य 'अग्रसर' की आवश्यकता है तो क्या किसी भी राजनीतिक विवशता में इतनी शक्ति है जो 'संघ' को उसके कर्त्तव्य के निर्वहन से रोक सके ? अगर समाज की संगठित शक्ति को अपने औचित्य को सिद्ध करने से कोई भी राजनीतिक दल ने रोकने का या चुनौती देने का प्रयास किया तो वो अपनी दुर्दशा के दोषी स्वयं होंगे; अब इसे सलाह मानें या चेतावनी, निर्णय का अधिकार मैं व्यक्तिगत विवेक पर छोड़ता हूँ !...भारत माता की जय !".......Mohan Bhagwat ji

Amar Naath Choudhary "अगर कभी कोई ऐसी परिस्थिति आयी थी जब रातों रात एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को हटाकर एक प्रचारक को प्रदेश का नेतृत्व सौंप दिया गया था तो आज राष्ट्रीय पटल पर परिस्थितियां उस समय से कहीं अधिक विषम व् चिंताजनक है;
वो प्रचारक श्री नरेंद्र मोदी जी ही थे जिन्होनें पहली बार बिना किसी चुनाव लड़े मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और वह दल भाजपा ही था जिसने उन्हें तब मुख्यमंत्री बनाया था, ऐसे में, आज अगर राष्ट्रीय स्तर पर समय की आवश्यकताएं वैसी ही घटना की पुनरावृति के लिए समाज की संगठित शक्ति को बाध्य करती है तो न ही भाजपा और न ही श्री नरेंद्र मोदी जी को कोई समस्या या शिकायत होनी चाहिए।
आखिर राष्ट्र के परम वैभव को प्राप्त करना ही हमारा प्रारब्ध है और किसी भी परिस्थिति में हमें हमारा अंतिम लक्ष्य नहीं भूलना चाहिए;
समय गतिशील है और इसलिए निश्चित है की यह वर्त्तमान भी जल्द ही अतीत बन जाएगा और तब भविष्य हमारे महत्व का मूल्याङ्कन केवल इस आधार पर करेगा की जब समय ने हमें अवसर प्रदान किया तो हमने उसका क्या किया ?
जब साधना को अवसर का संयोग प्राप्त हो तो वही भाग्य उदय कहलाता है , ऐसे में, जब समय ने विचारधारा को भारत के भाग्योदय का माध्यम बनाया तो हम इस अवसर का क्या कर रहे हैं ?
क्या केवल सत्ता के लिए की जाने वाली वर्त्तमान की राजनीति को हम अपने राष्ट्र के भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण मानने की गलती कर सकते हैं; अगर हाँ, तो विश्वास मानिये की राष्ट्र हमारी इस गलती की कीमत अपनी संभावनाओं से चुकाएगा। " Amar
वो प्रचारक श्री नरेंद्र मोदी जी ही थे जिन्होनें पहली बार बिना किसी चुनाव लड़े मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और वह दल भाजपा ही था जिसने उन्हें तब मुख्यमंत्री बनाया था, ऐसे में, आज अगर राष्ट्रीय स्तर पर समय की आवश्यकताएं वैसी ही घटना की पुनरावृति के लिए समाज की संगठित शक्ति को बाध्य करती है तो न ही भाजपा और न ही श्री नरेंद्र मोदी जी को कोई समस्या या शिकायत होनी चाहिए।
आखिर राष्ट्र के परम वैभव को प्राप्त करना ही हमारा प्रारब्ध है और किसी भी परिस्थिति में हमें हमारा अंतिम लक्ष्य नहीं भूलना चाहिए;
समय गतिशील है और इसलिए निश्चित है की यह वर्त्तमान भी जल्द ही अतीत बन जाएगा और तब भविष्य हमारे महत्व का मूल्याङ्कन केवल इस आधार पर करेगा की जब समय ने हमें अवसर प्रदान किया तो हमने उसका क्या किया ?
जब साधना को अवसर का संयोग प्राप्त हो तो वही भाग्य उदय कहलाता है , ऐसे में, जब समय ने विचारधारा को भारत के भाग्योदय का माध्यम बनाया तो हम इस अवसर का क्या कर रहे हैं ?
क्या केवल सत्ता के लिए की जाने वाली वर्त्तमान की राजनीति को हम अपने राष्ट्र के भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण मानने की गलती कर सकते हैं; अगर हाँ, तो विश्वास मानिये की राष्ट्र हमारी इस गलती की कीमत अपनी संभावनाओं से चुकाएगा। " Amar
Sanju Singh संघ का उद्देश्य सत्ता सुख भोगना नही बल्कि राष्ट्र निर्माण करना है ओर संघ इसी उद्देश्य में प्रयासरत है।
Vishwas Tiwari संघ को छोड़ कर गये जुझरू स्वयं सेवक को पुन:जोडने की आवश्यकता है
पुराने लोग जो आज भी अच्छा कार्य कर रहे है ऐसे स्वयं सेवक नदि के दो धाराओ मे बट गये है उन्हे एक धारा मे लाने की आवश्यकता है
साहकरिता को बढावा ही देना
संस्कार युक्त शिक्षा जो सैद्धान्तिक के साथ साथ व्यवहरिकता भी हो
पुराने लोग जो आज भी अच्छा कार्य कर रहे है ऐसे स्वयं सेवक नदि के दो धाराओ मे बट गये है उन्हे एक धारा मे लाने की आवश्यकता है
साहकरिता को बढावा ही देना
संस्कार युक्त शिक्षा जो सैद्धान्तिक के साथ साथ व्यवहरिकता भी हो
Pankaj Gautam यह पेज कौन चलाता है भाई.मा. मोहनजी तो जरूर नहीं चलाते होंगे वरना खुद का महिमा मंडन करने वाला यह फ़ोटो यहाँ नहीं होता जिसमे भाजपा नेता उनसे मिलने को आनेवाली बात लिखी है..कार्यकर्ताओका अतिउत्साह ही कई बार संघ और संघटन को परेशानियों में डाल देता है...
😒
Kishan Khileri जय हो परम पूजनीय जी



